(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.183. अध्यायः 183
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
पाण्डवानां द्रुपदनगरप्रथानम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-183-0x(1050)(8248)
एतच्छ्रुत्वा ततः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ।
मनसा द्रौपदीं जग्मुरनङ्गशरपीडिताः॥' 1-183-1(8249)
ततस्तां रजनीं राजञ्छल्यविद्धा इवाभवन्।
सर्वे चास्वस्थमनसो बभूवुस्ते महाबलाः॥ 1-183-2(8250)
ततः कुन्ती सुतान्दृष्ट्वा सर्वांस्तद्गतचेतसः।
युधिष्ठिरमुवाचेदं वचनं सत्यवादिनी॥ 1-183-3(8251)
चिररात्रोषिताः स्मेह ब्राह्मणस्य निवेशने।
रममाणाः पुरे रम्ये लब्धभैक्षा महात्मनः॥ 1-183-4(8252)
यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च।
सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनःपुनररिन्दम॥ 1-183-5(8253)
पुनर्दृष्टानि तानीह प्रीणयन्ति न नस्तथा।
भैक्षं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन॥ 1-183-6(8254)
ते वयं साधु पञ्चालान्गच्छाम यदि मन्यसे।
अपूर्वदर्शनं वीर रमणीयं भविष्यति॥ 1-183-7(8255)
सुभिक्षाश्चैव पञ्चालाः श्रूयन्ते शत्रुकर्शन।
यज्ञसेनश्च राजाऽसौ ब्रह्मण्य इति सुश्रुम॥ 1-183-8(8256)
एकत्र चिरवासश्च क्षमो न च मतो मम।
ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे॥ 1-183-9(8257)
युधिष्ठिर उवाच। 1-183-10x(1051)
भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम्।
अनुजांस्तु न जानामि गच्छेयुर्नेति वा पुनः॥ 1-183-10(8258)
वैशम्पायन उवाच। 1-183-11x(1052)
ततः कुन्ती भीमसेनमर्जुनं यमजौ तथा।
उवाच गमनं ते च तथेत्येवाब्रुवंस्तदा॥ 1-183-11(8259)
तत आमन्त्र्य तं विप्रं कुन्ती राजसुतैः सह।
प्रतस्थे नगरीं रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः॥ ॥ 1-183-12(8260)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 183 ॥


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